10/13/2009

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1/07/2009

संजय बेंगाणी ने जीती पहेली, ये हैं ब्रेल लिपि के आविष्‍कारक लुई ब्रेल

ब्रेल का जन्‍म 4 जनवरी 1809 को फ्रांस की राजधानी पेरिस के पास कूवरे नामक गॉंव में हुआ था। उनके पिता का नाम साइमन ब्रेल था। वे एक चर्मकार थे। लुई ब्रेल जब 3 साल के थे, तभी उनकी एक ऑंख में चमड़ा सिलने वाला सूजा लग गया, जिससे उनकी ऑंख खराब हो गयी। बाद में इन्‍फेक्‍शन के कारण उनकी दूसरी ऑंख भी खराब हो गयी। लेकिन उसके बावजूद उन्‍होंने हिम्‍मत नहीं हारी और संगीत की शिक्षा प्राप्‍त की। कुछ समय के बाद वे इंस्‍टीटयूशन फॉर ब्‍लॉइण्‍ड यूथ में संगीत के शिक्षक हो गये और अपनी जिंदगी गुजर बसर करने लगे।


सन 1821 में नेपोलियन के निर्देश पर सैनिकों के लिए रात में पढ़ने हेतु एक नई प्रणाली का निर्माण हुआ। नेपोलियन के निर्देश पर इंस्‍टीटयूशन फॉर ब्‍लॉइण्‍ड यूथ में जब उस प्रणाली का प्रदर्शन किया गया, तो लुई ब्रेल उससे बहुत प्रभावित हुए। किन्‍तु ब्रेल ने महसूस किया कि उस प्रणाली में कई कमियॉं हैं। उन्‍होंने यह भी देखा कि मनुष्‍य की सबसे संवेदनशन उंगली तर्जनी एक बार में सर्वाधिक 6 बिन्‍दु महसूस कर सकती है। इसी आधार पर उन्‍होंने 6 बिन्‍दुओं वाली 63 आकृतियों का निर्माण किया। यही आकृतियॉं बाद में ब्रेल लिपि के रूप में मशहूर हुई और दृष्टिहीनों की शिक्षा का माध्‍यम बनी।


लेकिन दुर्भाग्‍यवश ब्रेल को अपने जीवन में न तो ब्रेल लिपि को मान्‍यता मिली और न ही उन्‍हें मान सम्‍मान मिल सका। 6 जनवरी 1852 में उनका देहान्‍त हो गया। उनकी मृत्‍यु के 2 साल बाद फ्रांस के लोगों को ब्रेल लिपि का महत्‍व महसूस हुआ और दृष्टिहीनों की शिक्षा के लिए ब्रेल लिपि का उपयोग किया जाने लगा।

आज भले ही लुई ब्रेल इस संसार में नहीं हैं, पर वे अपनी लिपि के माध्‍यम से इस संसार में विद्यमान हैं और संसार भर के तमाम दृष्टिहीन लोगों के जीवन में रौशनी की किरण के रूप में जगमगा रहे हैं।


अब आते हैं पहेली के उत्‍तरों पर। सबसे पहला उत्‍तर डा0 दिनेश चंद्र अवस्‍थी जी का आया, पर वे ब्रेल को पहचान नहीं सके। उसके बाद कीर्ति वैद्य ने एक नाम सुझाया न्‍यूटन। मोहन वशिष्‍ठ जी तीन बार ब्‍लॉग पर आए। दो बार उन्‍होंने आश्‍वासन दिया कि अभी आपको जवाब देते हैं। पर कुछ देर बाद वे कोई हिंट मांग कर शान्‍त हो गये। उसके बाद आए कॉमन मैन ने शुभकामनाऍं देकर इतिश्री कर ली। विनय बाबू को लगा कि यह कोई रशियन महापुरूष होंगे।

सबसे पहला जवाब संजय बेंगाणी जी का आया। उन्‍होंने मजेदार जवाब देते हुए कहा कि लग भी नहीं रहे और शक भी है कि ये ब्रेल हैं।


उसके बाद अभिषेक और कविता ने कीर्ति की बात का समर्थन किया और राज भाटिया जी ने

Feynman, Richard P का नाम सुझाया। उसके बाद रंजना, अरविंद मिश्र और विशाल ने अनभिज्ञता जगाई तथा पा0ना0 सुब्रमणियन एवं मोहन वशिष्‍ठ जी ने थक हार कर न्‍यूटन का सहारा लिया। अब अफसोस सही जवाब रहा सिर्फ संजय बेंगाणी जी का। उन्‍हें पहेली जीतने की हार्दिक बधाईयॉं।


अरे, संजय जी जीत गये तो क्‍या हो, आप लोगों ने भी पहेली बूझने का साहस किया, इसके लिए आप सबको भी हार्दिक बधाईयॉं।

1/06/2009

क्‍या आप इन्‍हें जानते हैं? अरे, कोशिश तो करिए....



क्‍या आप इन्‍हें जानते हैं? अरे, कोशिश तो करिए....

क्‍या कहा, कोई हिंट। अरे भई, ये बहुत मशहूर व्‍यक्ति हैं और पूरी दुनिया में बहुत से लोग ऐसे हैं, जो इनके सहारे ही जिंदगी के रास्‍तों में प्रगति पथ पर चढ रहे हैं। तो बताइए ये महापुरूष कौन हैं?

11/06/2008

चंद्रमा की धरती पर पड़े भारतीय के कदम

अब मैं अपने नीचे छोटे घर तथा बस्ती देख रहा था और मुझे यह जान पड़ता था कि मैं एक विचित्र नगर में उतर रहा हूँ। ठीक मेरे नीचे छोटे-छोटे मनुष्यों का एक समूह एकत्र था, जोकि न तो कुछ शब्द उच्चारण करते और न मेरी सहायता करने पर कुछ उत्साह दिखाते थे, पर मूढ़ों के समान दांत निपोरे मुंह बाये खड़े थे और मुझे तथा मेरे बलून को ध्यानपूर्वक देख रहे थे। मैं ग्लानि से उनकी ओर से नेत्र फेर लिया और ऊपर की ओर अपनी पृथ्वी को देखने लगा, जोकि इस समय एक बड़े तांबे के तथा धुंधली ढ़ाल के समान कोई दो अंश व्यास में दिखाई दे रही थी।


यह अंश बाबू केशव प्रसाद सिंह द्वारा रचित विज्ञान कथा चंद्रलोक की यात्रा का है, जो सरस्वती के जून 1900 के अंक में प्रकाशित हुई थी। उक्त कहानी में लेखक द्वारा चंद्रमा पर जाने का रोचक वर्णन है। हालाँकि केशव प्रसाद सिंह ने चंद्रमा पर मानवों की बस्ती को दर्शाया है, जोकि वैज्ञानिकों द्वारा गलत साबित की जा चुकी है।


आपको 20 जुलाई 1969 का वह दिन शायद याद हो, जब अमेरिकी अंतरिक्ष यान अपोलो-11 के कमाण्डर नील आर्मस्ट्रांग ने पहले मानव के रूप में चंद्रमा की धरती पर कदम रखे थे। वह दिन भारतीय वैज्ञानिकों के लिए एक स्वप्न जगाने वाला दिन था। और उस स्वप्न को हकीकत में बदलने की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं। हालाँकि अभी भारत द्वारा जो अंतरिक्ष यान चंद्रमा पर भेजा गया है, वह मानव रहित है, पर जल्दी ही किसी भारतीय वैज्ञानिक को भी चंद्रमा की धरती पर कदम रखने का मौका भी प्राप्त होगा।


चंद्रयान-1 हालाँकि अभी भारतीय वैज्ञानिक दल की एक शुरूआत मात्र है। पर इसके जो परिणाम आएंगे, वे चंद्र मिशन को गति देने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। चंद्रमा की धरती पर कॉलोनियाँ बसाने की कल्पना अभी भले ही कुछ लोगों को दूर की कौड़ी लग रही हो, पर एक न एक दिन वह सपना भी साकार होगा। और तब हर भारतीय चंद्रमा की धरती पर किसी भारतीय के पहुंचने की घटना को सिर्फ किस्से कहानियों में नहीं पढ़ेगा, बल्कि जीवंत रूप में उसका गवाह भी बनेगा।


हर भारतवासी को उस गौरवशाली क्षण का इंतजार रहेगा।

9/25/2008

लखनऊ पुस्तक मेले में ब्लॉगर्स की धूम

गत कई वर्षों से लखनऊ में पुस्तक मेले का आयोजन नई नई सफलताएं गढ रहा है। पुस्तक मेले के आयोजक मेले के दौरान विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ-साथ प्रतिदिन "लेखक से मिलिए" कार्यक्रम का आयोजन करते हैं, जिसमें स्थानीय लेखकों को आमंत्रित किया जाता है। लेखक पहले अपने बारे में बताते हैं, फिर दर्शक/पाठक लेखकों से उनकी रचना प्रक्रिया आदि के बारे में सवाल करते हैं।


इसी क्रम में दिनांक 23 सितम्बर 2008 को 6-00 बजे आयोजित "लेखक से मिलिए" कार्यक्रम में शहर के प्रतिष्ठित रचनाकार श्री मिर्जा हसन नासिर, श्री मयंक एवं श्री जाकिर अली "रजनीश" को आमंत्रित किया गया। श्री रजनीश ने उक्त अवसर पर साहित्य के नए माध्यम के रूप में तेजी से उभर रहे विकल्प के रूप में ब्लॉग जगत की चर्चा की और साहित्यकारों का आहवान किया कि वे ज्यादा से ज्यादा मात्रा में हिन्दी साहित्य को अन्तर्जाल पर स्थापित करके उसे विश्वव्यापी बनायें।


इस सम्बंध में उन्होंने अभिव्यक्ति, रचनाकार, हिन्द युग्म, साहित्य शिल्पी, हमराही, बाल-मन और बालउद्यान का विशेष रूप से जिक्र किया। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि आने वाला समय इन्टरनेट का ही है। इसलिए रचनाकारों को चाहिए कि वे इस माध्यम से जुडें और अन्तर्जाल पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराएं। उन्होंने उदय प्रकाश और अशोक चक्रधर जैसे रचनाकारों के ब्लॉग का जिक्र करते हुए कहा कि उनका प्रयोग बहुत सफल रहा है। ये लोग जितना पत्र पत्रिकाओं के द्वारा पढे जाते हैं, उससे कहीं ज्यादा अन्तर्जाल पर उपलब्ध अपने ब्लॉग के द्वारा पढे जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि ब्लॉग की लोकप्रियता का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि सदी के महानायक अमिताभ बच्चन, लोकप्रिय अभिनेता और निर्देशक आमिर खान तथा ठेठ गंवई पृष्ठभूमि से जुडे अभिनेता मनोज बाजपेई भी अपना ब्लॉग लिख रहे हैं।


जाकिर अली "रजनीश" ने इस बात पर बल दिया कि भारतीय समाज में तकनीकी जानकारी न होने के कारण बहुत से लोग अन्तर्जाल से जुड नहीं पा रहे हैं। इसके लिए हिन्दी प्रेमी संस्थाओं को आगे आना चाहिए। उन्हें चाहिए कि वे न सिर्फ साहित्यकारों को ब्लॉग लेखन की ट्रेनिंग देकर उनका उत्साह बढाएं बल्कि अपने स्तर पर भी साहित्य को अन्तर्जाल पर प्रसारित करने का बीडा उठाएं।


श्री रजनीश ने इस सम्बंध में अपने कम्यूनिटी ब्लॉग "तस्लीम" का जिक्र करते हुए कहा कि लोगों को अन्तर्जाल के करीब लाने के लिए उनके मन में बैठा हुआ डर दूर करना होगा। इसके लिए तस्लीम अगले वर्ष बडे पैमाने पर ब्लॉग लेखन सम्बंधी कार्यशालाएँ आयोजित करने की तैयारी कर रहा है।

अन्तर्जाल पर ब्लॉग जगत में साहित्य की बढती उपस्थिति से दर्शकगण काफी उत्साहित दिखे और उन्होंने अपनी प्रसन्नता व्यक्त की। इस अवसर पर लखनऊ के दो अन्य ब्लॉगर रौशन और अमित कुमार ओम भी उपस्थित थे।

9/12/2008

बात मानसिकता की है

ब्रह्मांड की उत्पत्ति के रहस् को जानने के लिए जब जमीन के अंदर 27 किलोमीटर लंबी एक सुरंग में लार्ज हेड्रोन कोलाइडर (एलएचसी) मशीन के जरिए बिग बैंग विस्फोट की योजना का समाचार जब भारतीय समाचार चैनलों को प्राप् हुआ, तो उन्होंने बिना सोचे समझे 'प्रलय' का राग अलापना शुरू कर दिया। यह महाप्रयोग संसार के 85 देशों के 2500 वैज्ञानिकों की देखरेख में सम्पन् हुआ, जिसपर 92 अरब डालर (4.1 खरब रुपये) का खर्च आया।
कई सालों की मेहनत के बाद बनाई गयी इस वैज्ञानिक परियोजना से जुडे वैज्ञानिक बार बार यह दावा कर रहे थे कि इस विस्‍फोट से धरती को किसी प्रकार का खतरा नहीं है, बावजूद इसके समाचार चैनलों पर सम्‍भावित प्रलय और उसके उपचार के लिए धार्मिक कर्मकाण्‍डों के टोटके दोहराए जाते रहे। इस प्रायोजित प्रलय का आतंक आज जनमानस पर कुछ इस तरह हुआ कि एक किशोरी ने प्रलय के डर से आत्‍महत्‍या कर ली।
एक ओर यह आलम था, तो दूसरी ओर जिनेवा में, जहॉं पर धरती के 100 मीटर नीचे यह विस्‍फोट होना था, लोग अपनी आम जिंदगी जी रहे थे और लोगों को हैप्‍पी एलएचसी का मैसेज भेज रहे थे। लेकिन किसी भी चैनल ने इस तरह का समाचार प्रसारित नही किया।
इससे यह पता चलता है कि इन समाचार चैनलों को दर असल ना तो समाचार से कोई मतलब होता है और ना ही सामाजिक ज़िम्मेदारियों से। ऐसी दशा में सरकार को यह चाहिये की वह इनपर लगाम कसे। अन्यथा पता नही कब ये लोग किस छोटी सी बात का बतंगड बना दें और हड़बड़ी में वह मेन कोई बड़ी गड़बड़ हो जाये।